खाकी का ‘सरेंडर’: सत्ता की हनक और रसूखदारों के खौफ में सिसकती पुलिस व्यवस्था
आज के दौर में पुलिसिंग का चेहरा पूरी तरह बदल चुका है। कभी अपराधियों के मन में खौफ पैदा करने वाली ‘खाकी’ आज खुद डरी और सहमी नजर आती है। विडंबना देखिए कि जिस पुलिस के कंधों पर कानून की रक्षा का भार है, वही पुलिस आज सत्ता के गलियारों में बैठे नेताओं, ढोंगी पाखंडियों और आर्थिक रूप से सक्षम रसूखदारों के सामने अपना ‘इकबाल’ (प्रताप) खो चुकी है। आलम यह है कि वर्दी की चमक अब सफेदपोशों की चौखट पर फीकी पड़ गई है।
सत्ता की हनक और ‘पंगु’ होती पुलिस
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से लेकर आम गलियारों तक यह चर्चा आम है कि पुलिस अब स्वतंत्र जांच एजेंसी नहीं, बल्कि सत्ताधारी दलों की ‘कठपुतली’ बनकर रह गई है। जब भी किसी रसूखदार नेता या उनके करीबियों पर कानून का शिकंजा कसने की कोशिश होती है, तो ऊपर से आने वाला एक ‘फोन कॉल’ पूरी जांच की दिशा मोड़ देता है। स्थिति यहाँ तक भयावह हो चुकी है कि सरेआम पुलिसकर्मियों की वर्दी पर हाथ डाला जा रहा है, उनके साथ अभद्रता की जा रही है, लेकिन पलटकर कार्रवाई करने के बजाय पुलिसकर्मी ‘मौन’ रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं। उन्हें डर है कि अगर उन्होंने कानून का पालन किया, तो इनाम में उन्हें ‘सस्पेंशन’ या ‘लूप लाइन’ में तबादला थमा दिया जाएगा।
पाखंडी ‘बाबाओं’ और धनपशुओं का आतंक
सिर्फ राजनीति ही नहीं, धर्म के नाम पर दुकान चलाने वाले पाखंडियों और धन के बल पर सिस्टम खरीदने वाले ‘सक्षमों’ के सामने भी पुलिस असहाय दिखती है। कानून की किताबें इन खास लोगों के लिए अलग तरह से पढ़ी जाती हैं। संगीन अपराधों में नाम होने के बावजूद इन रसूखदारों की गिरफ्तारी तो दूर, पुलिस उनके सामने हाथ जोड़े खड़ी नजर आती है। यह ‘सेलेक्टिव जस्टिस’ यानी चुन-चुनकर की जाने वाली कार्रवाई आम जनता के भरोसे को तोड़ रही है। जब गरीब के घर पर पुलिस का डंडा चलता है और अमीर की दहलीज पर खाकी नतमस्तक होती है, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है।
कार्यवाही से डरती वर्दी: मनोबल का गिरता स्तर
हाल की कई घटनाओं ने यह साबित किया है कि पुलिस अब कार्रवाई करने से कतराती है। अधिकारियों के मन में यह डर बैठ गया है कि यदि उन्होंने किसी ‘ऊंची पहुंच’ वाले व्यक्ति पर हाथ डाला, तो उनका करियर दांव पर लग सकता है। पुलिस के हाथ अब अपराधियों के गिरेबान तक पहुंचने के बजाय फाइलें दबाने में ज्यादा व्यस्त हैं। जो पुलिस विभाग कभी अनुशासन और निडरता का प्रतीक था, वह अब ‘मैनेजमेंट’ और ‘समझौते’ की राह पर चल पड़ा है।
सिस्टम का पतन या मिलीभगत?

यह केवल व्यक्तिगत कायरता नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का पतन है। जब ट्रांसफर-पोस्टिंग का बाजार गर्म होता है और काबिलियत के बजाय ‘वफादारी’ को तरजीह दी जाती है, तो पुलिस अपना इकबाल खो देती है। रसूखदारों के पैरों में पड़ी खाकी अंततः अपराध को ही बढ़ावा देती है। जनता अब पूछ रही है कि क्या खाकी सिर्फ लाचारों पर रौब झाड़ने के लिए है? क्या कानून का शिकंजा कभी उन हाथों तक पहुंचेगा जो आज पुलिस की वर्दी को तार-तार कर रहे हैं?
यदि समय रहते पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त नहीं किया गया और वर्दी को उसका खोया हुआ सम्मान वापस नहीं मिला, तो समाज में अराजकता का ऐसा दौर आएगा जिसे संभालना नामुमकिन होगा। खाकी का इकबाल तभी वापस आएगा जब कानून सबके लिए बराबर होगा—चाहे वह सड़क पर चलने वाला आम आदमी हो या सत्ता के शीर्ष पर बैठा कोई बाहुबली।
-मनेन्दु पहारिया, संपादक दैनिक जनहित दर्शन, छतरपुर












