शराब की किल्लत की सुर्खियां शिक्षा-स्वास्थ्य पर भारी, समाज में नैतिक पतन के एक नए दौर की शुरुआत
देश के वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य में एक बेहद चिंताजनक और गंभीर प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। हालिया दिनों में मीडिया, सोशल मीडिया और आम जनमानस के बीच शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं की बदहाली से कहीं ज़्यादा चर्चा शराब न मिलने और उसकी किल्लत को लेकर हो रही है। जानकारों और विचारकों का मानना है कि जब किसी राष्ट्र में शराब की उपलब्धता से जुड़ी खबरें, स्कूलों और अस्पतालों की बदहाली की खबरों पर भारी पड़ने लगें, तो यह साफ संकेत है कि समाज में नैतिकता के पतन के साथ-साथ एक बड़ी गिरावट का नया दौर शुरू हो चुका है। स्थिति अब इतनी संवेदनशील हो चुकी है कि इसे महज़ ‘शर्मनाक’ कहना भी नाकाफी होगा।
विभिन्न राज्यों से आ रही मीडिया रिपोर्ट्स और जमीनी हकीकत पर गौर करें तो एक तरफ ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की दुर्दशा, डॉक्टरों की भारी कमी और सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव की खबरें अखबारों के अंदरूनी पन्नों में दबकर रह जाती हैं। दूसरी तरफ, शराब नीति में किसी बदलाव, ठेके बंद होने या शराब न मिलने से पैदा हुई कथित ‘अव्यवस्था’ को इस तरह पेश किया जाता है मानो यह कोई बहुत बड़ा राष्ट्रीय संकट हो। नागरिकों का एक बड़ा वर्ग जो बुनियादी अधिकारों, जैसे बेहतर इलाज और बच्चों की पढ़ाई के मुद्दों पर मौन रहता है, वही वर्ग शराब की अनुपलब्धता या उसकी कीमतों को लेकर सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक पर मुखर नजर आता है।
इस गहरे सामाजिक और सांस्कृतिक संकट के पीछे केवल आम जनता ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था भी जिम्मेदार मानी जा रही है। आज के दौर में सरकारों के लिए शराब राजस्व (राजकीय आय) कमाने का सबसे आसान और बड़ा जरिया बन चुकी है। यही वजह है कि संकट के समय में भी कई बार शराब की दुकानों को सुचारू रखने को प्राथमिकता दी जाती है। जब नीतियां ही शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे जीवन रक्षक और समाज सुधारक क्षेत्रों से ज्यादा शराब को तरजीह देने लगती हैं, तो पूरे समाज की सोच भी उसी दिशा में मुड़ जाती है। परिणामतः, समाज में ‘आवश्यकता’ और ‘व्यसन’ के बीच का अंतर पूरी तरह धुंधला हो चुका है।
इस पूरी स्थिति को लेकर समाजशास्त्रियों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि जब कोई समाज बुनियादी प्राथमिकताओं को भूलकर व्यसन की कमी पर हाहाकार मचाने लगे, तो वह चेतना के सबसे निचले स्तर पर पहुंच जाता है। शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली पर चुप्पी और शराब न मिलने पर मचा यह बवाल एक ऐसा आईना है, जो हमारी वास्तविक सामाजिक गिरावट को दर्शाता है। यदि अब भी समाज और सरकार ने अपनी प्राथमिकताओं को दुरुस्त नहीं किया, तो यह सामूहिक पतन देश के भविष्य को एक गहरे अंधकार की ओर धकेल देगा।
*मनेन्दु पहारिया, संपादक दैनिक जनहित दर्शन, छतरपुर*












