आज के दौर में जब हम एक सूचनाप्रधान समाज में जी रहे हैं, तब मुख्यधारा के मीडिया की भूमिका समाज को जागरूक और शिक्षित करने की होनी चाहिए थी। लेकिन वर्तमान परिदृश्य इसके ठीक विपरीत नजर आता है। देश के सबसे गंभीर और संवेदनशील विषय—जैसे अर्थव्यवस्था और वित्त, राष्ट्रीय सुरक्षा, और जटिल विदेश नीति—जिनके लिए गहन अध्ययन, अनुभव और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, उन्हें आज टेलीविजन स्टूडियोज में एक तमाशा बना दिया गया है। जिन गंभीर मेजों पर देश के शीर्ष अर्थशास्त्रियों, रक्षा विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों को बैठकर नीतिगत बारीकियों पर जनता को सही दिशा दिखानी चाहिए थी, वहां आज पाखंडी बाबाओं, धर्मगुरुओं और सोशल मीडिया के स्वघोषित ज्ञानियों को बिठाकर उनके सतही और बेतुके विचार जनता के बीच परोसे जा रहे हैं।
यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि देश के बौद्धिक ताने-बाने के लिए एक गंभीर खतरा भी है। जब जटिल आर्थिक नीतियों, जैसे जीडीपी की दर, राजकोषीय घाटा या अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों को किसी बाबा के अंधविश्वास या लोक-लुभावन दावों के तराजू में तौला जाता है, तो जनता के पास सही और सटीक जानकारी नहीं पहुंच पाती। सुरक्षा और विदेश नीति जैसे संवेदनशील मसले, जो वैश्विक कूटनीति, भू-राजनीति और सैन्य रणनीति से जुड़े होते हैं, उन्हें अंध-राष्ट्रवाद या धार्मिक चश्मे से देखना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। विशेषज्ञों की महती भूमिका को दरकिनार कर मूर्खों और वाचालों को आगे लाने का यह चलन समाज को तर्कहीनता और अंधकार की ओर धकेल रहा है।
मीडिया का यह रवैया मुख्य रूप से टीआरपी की भूख और सनसनीखेज खबरों से मुनाफा कमाने की होड़ का नतीजा है। एक विशेषज्ञ जब बात करेगा, तो वह आंकड़ों, तर्कों, इतिहास और वैश्विक संदर्भों के साथ बात करेगा, जिसमें समय और धैर्य की जरूरत होती है। इसके विपरीत, एक पाखंडी या अयोग्य व्यक्ति ऐसी बातें करेगा जो सुनने में चमत्कारी, विवादित और सनसनीखेज लगें, जिससे दर्शकों का ध्यान आसानी से खींचा जा सके। इस प्रक्रिया में गंभीर विमर्श पूरी तरह गायब हो जाता है और उसकी जगह एक ऐसा शोर ले लेता है जो जनता के सोचने-समझने की क्षमता को कुंद कर देता है।
किसी भी प्रगतिशील और लोकतांत्रिक राष्ट्र की रीढ़ उसकी बौद्धिक संपदा और विशेषज्ञों की राय होती है। जब नीतिगत फैसलों और सार्वजनिक बहसों से विचारकों, वैज्ञानिकों और विद्वानों को बेदखल कर दिया जाता है, तो पूरा समाज दिशाहीन होने लगता है। जनता को यह समझने की आवश्यकता है कि हर क्षेत्र का अपना एक विज्ञान और विशेषज्ञता होती है, और चमत्कारिक दावों से देश की अर्थव्यवस्था या सीमाएं सुरक्षित नहीं की जा सकतीं। यदि समय रहते मीडिया ने अपनी जिम्मेदारी नहीं समझी और जनता ने इन ‘तमाशों’ को खारिज नहीं किया, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर देंगे जो तथ्यों से दूर और भ्रम के जाल में फंसी होगी, जो किसी भी मजबूत राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा आंतरिक संकट है।
मनेन्दु पहारिया, संपादक दैनिक जनहित दर्शन, छतरपुर












